मगध राजकुमार को बुद्ध ने बताई सिद्धि प्राप्ति की राह

Veena

मगध का राजकुमार था श्रोण। बड़ा विलासी। हर समय मदिरा व कामिनियों से घिरा रहता। पर अचानक एक समय उसे भोग से विरक्ति हो गई। जीवन में वैराग्य आ गया। वह भगवान बुद्ध का शिष्य बन गया और भिक्षु का जीवन जीने लगा।

आहार त्यागकर मात्र जल पर रहने लगा। धूप में बैठकर ध्यान करता। इस सबसे शरीर सूखकर काला व कांटे जैसा हो गया। और कुछ समय बाद वह बीमार भी पड़ गया। उसे वीणा वादन अतिप्रिय था। एक समय की बात है वह बैठे-बैठे बीमारी की स्थिति में भी वीणा के माध्यम से मन को साधने का प्रयास कर रहा था, पर मन लग ही नहीं पा रहा था।

तभी भगवान बुद्ध ने पूछा – ‘वत्स, तुम यह क्या कर रहे हो? क्यों इतना कठोर तप कर रहे हो?’ वह बोला – ‘मुझे निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी है, इसीलिए कठिन तपस्या कर रहा हूं।’ भगवान बोले – ‘सिद्धि तो तुम तब पाओगे, जब अहं का विसर्जन करोगे।

अतिवाद का अहंकार तुम्हारे अंदर बैठा फुफकार रहा है। इस अतिवाद से निकलो।’ उन्होंने समझाते हुए कहा कि जैसे वीणा के तार ज्यादा कस दिए जाएं तो वीणा नहीं बजती और अगर ढीले छोड़ दिए जाएं तो भी वीणा नहीं बजती। उसी तरह यह शरीर भी एक जीवन-वीणा है।

इस जीवन-वीणा को टूटने मत दो। भगवान बुद्ध की बातों का निहितार्थ श्रोण की समझ में आ गया। जैसे ही उसने अपनी जीवन-साधना की लय ठीक कर ली, उसका ध्यान सफल होने लगा। सार यह है कि जीवन में अतिवाद दुख का कारण बनता है। अत: अतिवाद का त्याग जरूरी है।

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